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कोरबा में शिवाय हॉस्पिटल का नाम एक बार फिर विवादों के बीच चर्चा में है। अस्पताल को लेकर पुराने आरोपों और शिकायतों की फेहरिस्त पहले से ही सवालों के घेरे में रही है। कभी नर्सिंग होम एक्ट के तहत पंजीयन और नियमों के पालन को लेकर सवाल उठे, तो कभी अस्पताल के फ्रीजर में शव रखे होने के बावजूद फ्रीजर बंद मिलने का आरोप सामने आया। आयुष्मान योजना के तहत उपचार के बाद भी मरीजों से पैसे लेने की शिकायतें भी चर्चा में रही हैं। अब एक महिला के ऑपरेशन के करीब तीन महीने बाद बिगड़ी हालत ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीटी स्कैन में ऑपरेशन वाली जगह पर करीब 80 सीसी मवाद जमा होने का दावा किया गया है। पति ने कलेक्टर, CMHO और SP तक शिकायत पहुंचाकर मेडिकल बोर्ड से जांच की मांग की है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस कल्चर जांच के सैंपल को लेकर परिजन सवाल उठा रहे हैं, उस पर संबंधित लैब संचालक भी स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए। अब सवाल है कि आखिर शिवाय हॉस्पिटल को लेकर बार-बार शिकायतें क्यों सामने आती हैं और स्वास्थ्य विभाग इन मामलों में क्या कार्रवाई कर रहा है ?
शिकायतकर्ता विकास कुमार अग्रवाल के अनुसार, उनकी पत्नी सोनम अग्रवाल का करीब तीन महीने पहले कोरबा स्थित शिवाय हॉस्पिटल में बच्चेदानी एवं फैलोपियन ट्यूब से संबंधित समस्या को लेकर लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की गई थी। परिवार को उम्मीद थी कि ऑपरेशन के बाद महिला स्वस्थ हो जाएंगी, लेकिन कुछ समय बाद ही टांके वाली जगह पर सूजन आने लगी और वहां से मवाद निकलने लगा।
विकास अग्रवाल द्वारा प्रशासन को दी गई शिकायत में 24 अक्टूबर 2026 की सीटी स्कैन रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, रिपोर्ट में ऑपरेशन वाली जगह पर लगभग 80 सीसी मवाद जमा होने का उल्लेख है। संक्रमण प्रभावित हिस्से का आकार 6.2 × 5.2 × 5 सेंटीमीटर बताया गया है।
शिकायत में दावा किया गया है कि संक्रमण पेट की दीवार की त्वचा के नीचे से मांसपेशियों और आसपास के ऊतकों तक फैल गया था। परिजनों के अनुसार, रिपोर्ट दिखाने के बाद पुराने टांके वाली जगह पर दोबारा चीरा लगाकर घाव खोला गया और बिना टांके लगाए ड्रेसिंग शुरू की गई। इसके बावजूद महिला को राहत नहीं मिली और शरीर के दूसरे स्थान से भी मवाद निकलने लगा। वहां भी चीरा लगाकर घाव खोलने की नौबत आई।
अब परिवार का सवाल है कि ऑपरेशन के बाद संक्रमण की स्थिति इतनी गंभीर कैसे हुई और समय रहते इसकी पहचान एवं उपचार के लिए क्या कदम उठाए गए ?
कल्चर जांच का सैंपल कहां गया ? लैब में रिकॉर्ड नहीं मिलने का आरोप
इस पूरे मामले में कल्चर एवं सेंसिटिविटी जांच का मुद्दा सबसे ज्यादा सवाल खड़े कर रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने डॉक्टर से कई बार मवाद का सैंपल लेकर कल्चर जांच कराने का आग्रह किया था। उन्हें सैंपल लैब भेजने की बात बताई गई, लेकिन अगले दिन जब उन्होंने संबंधित लैब से संपर्क किया तो कथित तौर पर सोनम अग्रवाल के नाम से कोई सैंपल प्राप्त होने की जानकारी नहीं मिली।इस मामले में डॉक्टर हेल्थ केयर डायग्नोस्टिक के संचालक एवं पैथोलॉजिस्ट डॉ. अजय स्वर्णकार से भी बातचीत की गई। उनसे सैंपल और संबंधित रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी गई। उन्होंने कहा कि मामला कहीं विचाराधीन है, इसलिए वे इस विषय पर कुछ नहीं बोलेंगे।
जब उनसे सीधे पूछा गया कि रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर हैं और क्या वे रिपोर्ट को सही मानते हैं, तब भी उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने इस सवाल पर भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
ऐसे में अब यह जानना जरूरी हो गया है कि संबंधित सैंपल वास्तव में लैब पहुंचा था या नहीं, जांच की प्रक्रिया क्या थी और रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले पैथोलॉजिस्ट की इस मामले में क्या भूमिका रही। इन सवालों का जवाब लैब के रिकॉर्ड और सक्षम विभाग की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
पुराने विवादों की चर्चा फिर तेज, नर्सिंग होम एक्ट से लेकर आयुष्मान तक उठते रहे सवाल
शिवाय हॉस्पिटल को लेकर मौजूदा शिकायत सामने आने के बाद अस्पताल के पुराने विवाद भी फिर चर्चा में हैं। अस्पताल के संचालन के शुरुआती दौर में नर्सिंग होम एक्ट के तहत आवश्यक पंजीयन और नियमों के पालन को लेकर आरोप लगाए जाते रहे हैं। इस संबंध में अस्पताल के पंजीयन की तारीख, अनुमति और स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षण रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
एक पुराने मामले में अस्पताल के फ्रीजर में शव रखे जाने के दौरान फ्रीजर चालू नहीं होने का आरोप भी परिजनों की ओर से लगाए जाने की बात सामने आई थी। आरोप था कि परिजन जब अस्पताल पहुंचे तो फ्रीजर बंद मिला। इस घटना को लेकर उस समय क्या शिकायत हुई और विभाग ने क्या कार्रवाई की, इसकी आधिकारिक स्थिति सामने आना जरूरी है।
इसके अलावा आयुष्मान योजना के तहत उपचार के बाद भी मरीजों से कथित रूप से अतिरिक्त पैसे लेने की शिकायतें भी अस्पताल को लेकर उठती रही हैं। इन आरोपों की वास्तविकता संबंधित मरीजों की शिकायतों, भुगतान रसीदों और आयुष्मान योजना के रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकती है।
सवाल यह है कि यदि पहले भी शिकायतें सामने आई थीं तो स्वास्थ्य विभाग ने क्या जांच की ? क्या अस्पताल के पंजीयन और संचालन की कभी व्यापक समीक्षा हुई ? क्या पुराने मामलों में कार्रवाई की गई ? या शिकायतें आने के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया ?
शिवाय हॉस्पिटल से जुड़े इस ताजा मामले ने एक बार फिर निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। एक ओर महिला की सेहत का सवाल है, दूसरी ओर कल्चर जांच के सैंपल और मेडिकल रिकॉर्ड की पारदर्शिता का। पुराने विवादों को लेकर उठे सवाल भी अब प्रशासनिक जांच की मांग को और गंभीर बनाते हैं।
अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट करना होगा कि अस्पताल के पंजीयन, संचालन, उपचार संबंधी रिकॉर्ड, आयुष्मान योजना की शिकायतों और लैब की जांच प्रक्रिया की समीक्षा कब होगी। महिला को उचित उपचार मिले और शिकायत में उठाए गए हर सवाल का दस्तावेजों के आधार पर जवाब सामने आए, यही परिवार की मांग है।
