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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कोरबा पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी नाराजगी जताते हुए साफ कर दिया कि गिरफ्तारी और रिमांड जैसी कानूनी प्रक्रियाओं में लापरवाही किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने पुलिस विभाग को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि केवल “सख्त चेतावनी” देकर मामले को खत्म नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कोरबा के चर्चित मामले की सुनवाई करते हुए एसपी कोरबा को सीधे निर्देश दिए कि संबंधित प्रधान आरक्षक के कामकाज पर लगातार निगरानी रखी जाए और भविष्य में दोबारा गलती होने पर तत्काल कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।
घर में घुसकर तलाशी, मारपीट और DVR ले जाने का आरोप
पूरा मामला राजगामार निवासी अजय अग्रवाल की रिट याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया कि 29 मार्च 2026 को बालको थाना पुलिस बिना वारंट उनके घर और दुकान में घुस गई, परिवार के साथ मारपीट की और सीसीटीवी का DVR भी अपने साथ ले गई।
मामले की सुनवाई के दौरान JMFC कोर्ट ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए रिमांड आवेदन खारिज कर दिया था और एसपी व डीजीपी को दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। कार्रवाई नहीं होने पर मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट के तेवर देख हरकत में आया पुलिस विभाग
पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने एसपी कोरबा से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया। इसके बाद विभागीय जांच कराई गई। जांच में पुलिस ने दावा किया कि याचिकाकर्ता का बेटा कई मामलों का आरोपी है और पुलिस केवल नोटिस तामील कराने गई थी। लेकिन इसी जांच में यह भी सामने आया कि प्रधान आरक्षक गुरुवर सिंह ने गिरफ्तारी से जुड़ी BNSS चेकलिस्ट सही तरीके से नहीं भरी और रिमांड के दौरान अदालत में भी उपस्थित नहीं हुए।
‘सिर्फ चेतावनी देकर नहीं बच सकते’
एसपी ने कोर्ट को बताया कि पहली गलती मानते हुए प्रधान आरक्षक को 23 जून 2026 को “सख्त चेतावनी” देकर छोड़ दिया गया।लेकिन हाई कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट कहा कि “सिर्फ चेतावनी देकर मामले का अंत नहीं माना जा सकता।”
एसपी को कोर्ट के सख्त निर्देश
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी, रिमांड और जांच की प्रक्रिया में कानून का अक्षरशः पालन होना चाहिए।
कोर्ट ने एसपी को दिया निर्देश
संबंधित प्रधान आरक्षक के आचरण और कार्यप्रणाली पर लगातार नजर रखी जाए। भविष्य में दोबारा लापरवाही मिलने पर तत्काल कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।जिले के सभी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तारी व रिमांड संबंधी सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए जाएं।हाई कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी को पुलिस विभाग के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या इस आदेश के बाद पुलिस महकमे में गिरफ्तारी और जांच की प्रक्रिया में वास्तविक बदलाव देखने को मिलेगा, या फिर यह आदेश भी फाइलों तक ही सीमित रह जाएगा?
