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यह प्रसंग 1972 का है…
शिमला समझौते के बाद उसके प्रावधानों को लेकर विपक्ष में काफी असहमति थी। जनसंघ के प्रमुख नेताओं में शामिल अटल बिहारी वाजपेयी भी समझौते के आलोचक थे। संसद में उन्होंने इसके खिलाफ अपनी बात मजबूती से रखी थी।
इसी बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वाजपेयी को बातचीत के लिए बुलाया।
कहा जाता है कि दोनों ने कमरे में बैठकर बातचीत करने के बजाय बाहर चलते हुए बात करने का फैसला किया।
तभी अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई। किसी ने इंदिरा गांधी को एक छाता लाकर दिया।
इंदिरा जी ने छाता खोला…
और फिर जो हुआ, वह आज भी इस रिश्ते की एक खूबसूरत तस्वीर बनकर याद किया जाता है।
उन्होंने छाता अपने सिर पर रखने के बजाय अटल बिहारी वाजपेयी के सिर पर कर दिया।
वाजपेयी बात करते रहे और इंदिरा गांधी उनके ऊपर छाता थामे रहीं।
एक तरफ देश की प्रधानमंत्री…
दूसरी तरफ विपक्ष का बड़ा नेता…
विचारों में गहरा मतभेद…
लेकिन उस क्षण में दिखाई दी व्यक्तिगत शिष्टता और सम्मान की एक झलक।
इस प्रसंग का उल्लेख बाद में वरिष्ठ भाजपा नेता एस. शेषाद्रि चारी ने NDTV के एक कार्यक्रम में किया था। उनके अनुसार, उन्होंने इस तस्वीर के बारे में अटल जी से पूछा था और अटल जी ने उन्हें घटना का संदर्भ बताया था।
और यही इस कहानी को और खास बनाता है—
राजनीति में विरोध हो सकता है,
लेकिन विरोधी के प्रति सम्मान खत्म होना जरूरी नहीं।
इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति अलग-अलग विचारधाराओं की थी। दोनों ने एक-दूसरे की नीतियों का विरोध भी किया। लेकिन ऐसे प्रसंग बताते हैं कि उस दौर की राजनीति में व्यक्तिगत संवाद और संसदीय शिष्टाचार के लिए भी जगह थी।
शायद इसीलिए वह छाता आज केवल बारिश से बचाने वाला छाता नहीं लगता…
वह भारतीय राजनीति के एक ऐसे दौर की तस्वीर बन गया है, जब राजनीतिक विरोध के बीच भी इंसानी रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती थी। 🇮🇳
