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दीपावली का मौसम है। बाजार में मिठाई, कपड़े, पटाखे और सोने-चांदी पर बंपर ऑफर चल रहे हैं। लेकिन पत्रकारिता की मंडी में इस बार कुछ खास है। यहां मिठाई के डिब्बे नहीं, ब्यूरो चीफ के पैकेज बिक रहे हैं। यहां लक्ष्मी पूजन के साथ प्रेस कार्ड पूजन हो रहा है। यहां खबर लिखने की जरूरत नहीं, बस निर्धारित रकम जमा कीजिए और पत्रकारिता के सिंहासन पर विराजमान हो जाइए।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दीपावली सेल में आपका स्वागत है!
*मात्र 2100 रुपये में बनें ब्यूरो चीफ!*
जी हां, अब पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की पढ़ाई, वर्षों का अनुभव, खबरों की समझ और जनता के प्रति जिम्मेदारी की कोई आवश्यकता नहीं। बस 2100 रुपये निकालिए और ब्यूरो चीफ बन जाइए। पद ऐसा कि नाम के आगे ब्यूरो चीफ, काम ऐसा कि खबरों से ज्यादा पहचान-पत्र दिखाने में महारत!
*2500 रुपये में एक ब्यूरो चीफ के साथ दो रिपोर्टर फ्री!*
परिवार सहित पत्रकारिता में प्रवेश का सुनहरा अवसर। एक ब्यूरो चीफ और दो रिपोर्टर। घर में तीन सदस्य हैं तो तीनों पत्रकार। घर में दस सदस्य हैं तो अगली स्कीम का इंतजार कीजिए। पत्रकारिता अब पेशा नहीं, पारिवारिक व्यवसाय बन चुकी है। मां-बाप ब्यूरो चीफ, बेटा रिपोर्टर और बेटी विशेष संवाददाता। लोकतंत्र में परिवारवाद की नई परिभाषा!
*पांच जोड़ी रिपोर्टर खरीदिए, एक कॉपी राइटर और तीन ब्लॉक रिपोर्टर मुफ्त पाइए!*
यह ऑफर उन लोगों के लिए है जिन्हें खबरों से ज्यादा पत्रकारों की संख्या बढ़ाने में दिलचस्पी है। खबर लिखने वाला अलग, खबर समझने वाला अलग और खबर को बिना पढ़े छापने वाला अलग। तथ्य हों या न हों, खबर में नाम और फोटो होना जरूरी है। आखिर अखबार का पन्ना भी तो भरना है!
*आठ पेजीनेटर लेने पर एक ब्यूरो चीफ बिल्कुल मुफ्त!*
अखबार के पन्ने भरने वालों के लिए विशेष ऑफर। आठ पेज भरिए, एक ब्यूरो चीफ पाइए। खबरों में दम हो या न हो, पेज पूरे होने चाहिए। जनता को सूचना मिले या विज्ञापन, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर पत्रकारिता भी तो अब पैकेजिंग का कारोबार बन गई है!
*पीडब्ल्यूडी दलाल रिपोर्टर के लिए 1100 रुपये अतिरिक्त खर्च!*
यह विशेष पैकेज उन प्रतिभाशाली पत्रकारों के लिए है जिन्हें सड़क की गुणवत्ता से ज्यादा ठेकेदार की गुणवत्ता समझ आती है। पुल बन रहा हो, सड़क बन रही हो या सरकारी भवन की दीवार में दरार हो, खबर से पहले कमीशन का हिसाब जरूरी है। विकास की गंगा बह रही हो तो पत्रकारिता की नाव भी दलाली के चप्पू से चलनी चाहिए!
*बिका हुआ रिपोर्टर वापस नहीं होगा!*
कृपया खरीदने से पहले अपनी ईमानदारी की जांच कर लें। एक बार पत्रकारिता की मंडी में बिक गए तो वापसी की कोई गारंटी नहीं। कॉपी एडिटर बदलने का समय प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक निर्धारित है। निर्धारित समय के बाद शिकायत स्वीकार नहीं की जाएगी।
*दलाली के दौर में ईमानदारी का कोई वादा नहीं!*
अब सवाल यह है कि पत्रकारिता का यह बाजार आखिर किस दिशा में जा रहा है? कभी पत्रकार बनने के लिए लोग वर्षों संघर्ष करते थे। रात-रात भर खबरों के पीछे भागते थे। सत्ता से सवाल पूछते थे, अधिकारियों के दरवाजे खटखटाते थे और जनता की आवाज बनने का सपना देखते थे। अब कुछ जगहों पर पत्रकारिता का सपना प्रेस कार्ड के पैकेज में बदल गया है।
खबरों की जगह कार्ड, मेहनत की जगह पद और जनता की जगह विज्ञापनदाता ने ले ली है। पत्रकारिता का असली काम सत्ता से सवाल पूछना है, लेकिन यहां सवाल पूछने से पहले यह देखा जाता है कि सामने वाला विज्ञापन देगा या नहीं।
दीपावली पर नए ब्यूरो चीफ मिठाई बांटेंगे, नए रिपोर्टर पटाखे फोड़ेंगे और संपादक जी लक्ष्मी पूजन के साथ प्रेस कार्ड का पूजन करेंगे। कोई सरकारी कार्यालय में अपनी पहचान चमकाएगा तो कोई ठेकेदार के सामने अपनी पत्रकारिता का परिचय देगा।
लेकिन याद रखिए, पत्रकारिता का कार्ड खरीदने से पत्रकार नहीं बनते। पत्रकार वह है जो बिकने से इनकार करे, सत्ता से सवाल पूछे और जनता के भरोसे को अपनी सबसे बड़ी पूंजी समझे।
बाकी बाजार खुला है, ऑफर जारी है… और ईमानदारी फिलहाल स्टॉक में उपलब्ध नहीं है!
