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औद्योगिक नगरी कोरबा के शहरी और ग्रामीण इलाकों में इन दिनों नियमों को ताक पर रखकर मजदूरों की जान जोखिम में डाली जा रही है। विशेष रूप से नगर निगम के वार्ड क्रमांक 51 डांडपारा और ग्राम पंचायत नवागाँव कला सहित अन्य क्षेत्रों से हर सुबह और शाम ऐसे दृश्य आम हो चुके हैं, जहां माल ढोने वाले वाहनों (जैसे पिकअप, ट्राली आटो, ट्रैक्टर और छोटे ट्रकों) में क्षमता से तीन से चार गुना अधिक मजदूरों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस-ठूंस कर काम पर ले जाया और लाया जाता है। कुछ ही समय पहले कोरबा में मजदूरों से भरी पिकअप पलटी थी जिससे 9 मजदूर घायल हो गए थे, लेकिन इस बड़े हादसे के बाद भी न तो प्रशासन जागा है और न ही ठेकेदारों के मन में कानून का कोई खौफ दिख रहा है.
यातायात नियमों के अनुसार माल वाहक वाहनों में सवारियां बैठाना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। इसके बावजूद कमाई और चंद पैसों की बचत के चक्कर में निजी ठेकेदार और रसूखदार लोग रोजाना सैकड़ों श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। डांडपारा और नवागाँव कला जैसे श्रमिक बाहुल्य क्षेत्रों से तड़के ही इन गाड़ियों में मजदूरों को लाद दिया जाता है।
हादसे के बाद कौन लेगा जिम्मेदारी?
सड़क पर दौड़ते इन ‘यमदूत’ वाहनों को देखकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अगर कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो इन गरीब मजदूरों की मौत या अपंगता का जिम्मेदार कौन होगा? व्यावसायिक वाहन चालक और ठेकेदार चंद रुपयों के मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों को ताक पर रख चुके हैं, जिससे किसी भी वक्त भीषण सड़क दुर्घटना की आशंका बनी हुई है. यदि इन असुरक्षित वाहनों के साथ कोई अनहोनी होती है, तो इन गरीब मजदूरों की जान की जिम्मेदारी किसकी होगी—ठेकेदारों की, वाहन मालिकों की या मूकदर्शक बने प्रशासन की?
ठेकेदारों और नियोक्ताओं की लापरवाही: कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा मजदूरों को कार्यस्थल या फैक्ट्रियों तक पहुंचाने के लिए ठेकेदार जानबूझकर यात्री वाहनों की जगह माल वाहकों का इस्तेमाल करते हैं जो यातायात पुलिस और परिवहन विभाग की अनदेखी का नतीजा है. कोरबा में विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख चौकों और मुख्य मार्गों से ये वाहन बेधड़क गुजरते हैं, लेकिन चेकिंग के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है। प्रशासन द्वारा बड़ी कार्रवाई न किया जाना इस अवैध परिवहन को बढ़ावा दे रहा है,.!!
